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मप्र हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: लंबे समय तक सहमति से संबंध के बाद सिर्फ दुष्कर्म का आरोप लगाना स्वतः अपराध सिद्ध नहीं करता

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर पीठ ने व्यक्तिगत संबंधों और कानून की व्याख्या को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि दो बालिग व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से शारीरिक संबंध रहे हों, तो बाद में केवल दुष्कर्म का आरोप लगा देने भर से अपराध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता।

यह दूरगामी टिप्पणी न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की ग्रीष्मकालीन अवकाशकालीन एकलपीठ ने सिंगरौली निवासी एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका को सशर्त मंजूर करते हुए की।

क्या है पूरा मामला?

यह कानूनी विवाद सिंगरौली के रहने वाले राजेश चर्माकर से जुड़ा है। एक महिला ने राजेश के खिलाफ पुलिस में दुष्कर्म की प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि आरोपी ने उससे शादी का झूठा झांसा दिया और लंबे समय तक उसका शारीरिक शोषण किया। गिरफ्तारी की तलवार लटकती देख आरोपी राजेश ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

अदालत में आरोपी पक्ष की दलीलें

  • भावनात्मक जुड़ाव: आरोपी और शिकायतकर्ता महिला की जान-पहचान वर्ष 2020 में हुई थी। महिला के पति का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो चुका था, जिसके बाद दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और वे एक-दूसरे के करीब आए।
  • आर्थिक सहायता: आरोपी न केवल महिला के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा था, बल्कि समय-समय पर उसकी आर्थिक मदद भी करता था। दोनों के बीच संबंध पूरी तरह आपसी समझ पर आधारित थे।
  • शादी के झांसे का सच: बचाव पक्ष ने सबसे मजबूत दलील यह दी कि आरोपी पहले से विवाहित है और यह बात शिकायतकर्ता महिला को पहले दिन से पता थी। जब महिला को आरोपी के शादीशुदा होने की जानकारी थी, तो ‘शादी का झांसा देकर संबंध बनाने’ का आरोप तथ्यात्मक रूप से टिकता ही नहीं, क्योंकि यहाँ शादी की कोई कानूनी या वास्तविक संभावना थी ही नहीं।

हाई कोर्ट का अवलोकन: बालिगों की सहमति सर्वोपरि

मामले के सभी पहलुओं को देखने के बाद अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया दोनों पक्ष बालिग (Adults) हैं और दोनों के बीच एक लंबे समय तक आपसी रजामंदी से रिश्ता रहा है।

न्यायालय ने रेखांकित किया: “मामले की जांच अभी शुरुआती चरण में है और अंतिम सच क्या है, यह ट्रायल के दौरान पेश होने वाले साक्ष्यों से ही साफ होगा। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों और तथ्यों को देखते हुए आरोपी को जेल में रखना न्यायसंगत नहीं होगा।”

इन कड़े प्रतिबंधों के साथ मिली अग्रिम जमानत

​हाई कोर्ट ने आरोपी राजेश चर्माकर को राहत तो दी है, लेकिन इसके साथ ही कुछ सख्त शर्तें भी लागू की हैं। आरोपी को निर्देश दिए गए हैं कि वह:

  • ​जांच एजेंसी के साथ पूरी तरह सहयोग करेगा।
  • ​जांच अधिकारी (IO) द्वारा जब भी बुलाया जाएगा, नियत समय पर उपस्थित होगा।
  • ​जांच की किसी भी प्रक्रिया में कोई व्यवधान या बाधा उत्पन्न नहीं करेगा।
  • ​यदि मामले की आवश्यकता हुई, तो मेडिकल परीक्षण के लिए खुद को प्रस्तुत करेगा।
  • सबसे महत्वपूर्ण: वह किसी भी गवाह को डराने-धमकाने या सबूतों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश कतई नहीं करेगा।

फैसले के कानूनी मायने (Editor’s Take)

​कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह आदेश उन मामलों में एक बड़ा संदर्भ बनेगा जहाँ अमूमन रिश्तों में कड़वाहट आने या ब्रेकअप होने के बाद सीधे दुष्कर्म (IPC 376 / BNS की प्रासंगिक धारा) के तहत मामले दर्ज करा दिए जाते हैं। हालांकि, माननीय अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि यह राहत केवल अग्रिम जमानत के स्तर पर है। केस के गुण-दोष (Merits) पर अंतिम फैसला निचली अदालत में ट्रायल के बाद ही होगा।

​फिलहाल, इस आदेश ने आरोपी को पुलिसिया गिरफ्तारी से तात्कालिक लेकिन बड़ी राहत दे दी है।

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