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महाघोटाला एक्सक्लूसिव: रायगढ़ फोरलेन के नाम पर सरकारी खजाने में सेंध!

रायगढ़ में भ्रष्टाचार और भू-माफियाओं का गठजोड़ किस कदर व्यवस्था पर हावी है, इसका एक और ‘महाघोटाला’ अब बेनकाब हो चुका है। डिग्री कॉलेज से महापल्ली तक बन रहे फोरलेन प्रोजेक्ट में करोड़ों रुपये का मुआवजा हड़पने की एक बेहद सुनियोजित साजिश का पर्दाफाश हुआ है।

राजस्व विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से शासन की बेशकीमती ‘कोटवारी जमीन’ को एक निजी संस्था ‘रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी’ की जागीर बना दिया गया है। ‘ख़बर नवीस’ के हाथ लगे B-1 खसरा दस्तावेजों ने इस पूरे फर्जीवाड़े की पोल खोल दी है।

B-1 रिकॉर्ड से बड़ा खुलासा: करोड़ों का मुआवजा डकारने के लिए शासकीय ‘कोटवारी जमीन’ बन गई ‘रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी’ के नाम, फर्जी मुआवजे की तैयारी

B-1 रिकॉर्ड से बड़ा खुलासा: करोड़ों का मुआवजा डकारने के लिए शासकीय ‘कोटवारी जमीन’ बन गई ‘रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी’ के नाम, फर्जी मुआवजे की तैयारी

ख़बर नवीस डेस्क, रायगढ़ डिग्री कॉलेज से महापल्ली तक प्रस्तावित फोरलेन निर्माण की आड़ में रायगढ़ राजस्व विभाग एक बड़े घोटाले को अंजाम देने की फिराक में है। ग्राम पंडरीपानी की 2.8490 हेक्टेयर (लगभग 7 एकड़) शासकीय कोटवारी जमीन, जो नियमतः शासन के खाते में होनी चाहिए थी, उसे भू-अभिलेखों में हेराफेरी कर ‘रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी’ के नाम भूमिस्वामी के रूप में दर्ज कर दिया गया है। अब इसी फर्जी रिकॉर्ड के आधार पर सोसायटी के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये का फोरलेन मुआवजा प्रकरण तैयार किया जा रहा है।

क्या कहते हैं B-1 के दस्तावेज?

​’ख़बर नवीस’ के पास मौजूद भू-अभिलेख (B-1) की प्रमाणित प्रति के अनुसार:

  • ग्राम: पंडरीपानी (हल्का नं. 00038)
  • खसरा नंबर: 115
  • रकबा (क्षेत्रफल): 2.8490 हेक्टेयर
  • खातेदार का नाम: (1) रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी रायगढ़ की ओर से अध्यक्ष कमल किशोर (2) सचिव सुशील कुमार अग्रवाल।
  • स्वामित्व का प्रकार: भूमिस्वामी – कृषि भूमि।

​दस्तावेज चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि जिस जमीन को शासकीय मद में दर्ज होना था, उसे बाकायदा एक निजी एजुकेशन सोसायटी के नाम पर ‘भूमिस्वामी’ (मालिक) के रूप में चढ़ा दिया गया है।

कानून को ताक पर रखकर हुआ खेल

​छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 183 स्पष्ट रूप से कहती है कि ‘कोटवारी जमीन’ (सेवा भूमि) पूर्णतः शासकीय होती है। किसी भी कोटवार की मृत्यु के पश्चात यह भूमि स्वतः शासन के पास वापस आ जाती है। इसे किसी भी परिस्थिति में किसी सोसायटी, संस्था या निजी व्यक्ति के नाम पर हस्तांतरित या नामांतरित नहीं किया जा सकता।

ग्रामीणों के अनुसार, पंडरीपानी के कोटवार की मृत्यु लगभग 10 वर्ष पूर्व हो चुकी है। नियमतः उसी समय पटवारी और राजस्व निरीक्षकों (RI) को रिकॉर्ड दुरुस्त कर इसे वापस शासन के नाम करना था। लेकिन ऐसा करने के बजाय, भ्रष्ट तंत्र ने इसे ‘रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी’ के कब्जे में रहने दिया और बाद में कागजों में सोसायटी को ही इसका मालिक बना दिया।

80 करोड़ के मुआवजे पर गिद्ध दृष्टि

​आपको बता दें कि डिग्री कॉलेज से महापल्ली तक का यह फोरलेन 12 किलोमीटर लंबा NHAI (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) का प्रोजेक्ट है। इसमें कुल 45 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण होना है, जिसके लिए 80 करोड़ रुपये से अधिक की मुआवजा राशि बांटी जानी है। यह अधिग्रहण प्रक्रिया 2025 से चल रही है।

​चूंकि खसरा नंबर 115 की यह 2.8490 हेक्टेयर जमीन भी इसी फोरलेन की जद में आ रही है, इसलिए राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों ने मिलीभगत कर सोसायटी को अनैतिक लाभ पहुंचाने के लिए फाइलें दौड़ानी शुरू कर दी हैं। जो मुआवजा राशि सीधे सरकारी खजाने (शासन) में जानी चाहिए थी, उसे फर्जी तरीके से सोसायटी के खातों में ट्रांसफर करने की पूरी पटकथा लिखी जा चुकी है।

अधिकारियों ने नहीं सुनी मातहतों की बात

सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले में कई पटवारियों ने पूर्व में ही आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने उच्चाधिकारियों को लिखित में अवगत कराया था कि रायगढ़ एजुकेशन सोसायटी के नाम दर्ज यह जमीन दरअसल ‘कोटवारी जमीन’ है, अतः इसका नामांतरण वापस शासन के मद में किया जाए। लेकिन कमीशन और भ्रष्टाचार की अंधी दौड़ में आला अधिकारियों ने इस गंभीर मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

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