शहर के केवड़ाबाड़ी चौक से मरीन ड्राइव (बीड़ तालाब) तक बनने वाली ‘कैनाल लिंक रोड’ विकास का प्रतीक बनने के बजाय विवादों का अखाड़ा बन गई है। वार्ड क्रमांक 11 (जोगीडीपा और इंदिरा नगर) के सैकड़ों निवासियों की रातों की नींद उड़ी हुई है। वजह है नगर निगम का वह फरमान, जिसमें 29 मई 2026 तक उन्हें अपने मकान और दुकानें खाली करने का अल्टीमेटम दिया गया है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या शहर के विकास के नाम पर ‘प्रगति नगर’ जैसी बेदखली का पार्ट-2 दोहराया जाने वाला है? आइए सरल शब्दों में समझते हैं कि इस पूरी योजना में आखिर खेल क्या हुआ है।
क्या है सड़क की ‘डिजाइन’ का असली खेल?
नियमों और शुरुआती नक्शे के मुताबिक, इस सड़क को नाले के बिल्कुल किनारे-किनारे (समानांतर) बनाया जाना था। अगर ऐसा होता, तो मुख्य बस्ती के लोगों के घरों और दुकानों पर कोई खास असर नहीं पड़ता।
- बदलाव: लेकिन बाद में नक्शे में गुपचुप तरीके से बदलाव कर दिया गया। सड़क को नाले के किनारे से हटाकर घनी आबादी वाले मोहल्ले की तरफ मोड़ दिया गया।
- आरोप: स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि यह ‘रूट डायवर्जन’ शहर के बड़े कॉलोनाइजरों और बिल्डरों को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है, ताकि उनकी वीआईपी कॉलोनियों को एक चौड़ा और सीधा रास्ता मिल सके।
12 से 18 मीटर का ‘सरकारी हथौड़ा’
इस प्रोजेक्ट का सबसे डरावना पहलू सड़क की चौड़ाई है।
- पहले मास्टर प्लान में इस सड़क की चौड़ाई 12 मीटर (करीब 40 फीट) तय थी।
- अचानक इसे बढ़ाकर 18 मीटर (करीब 60 फीट) कर दिया गया।
इसका असर क्या हुआ? 40 फीट की सड़क में लोगों के घरों का कुछ ही हिस्सा टूट रहा था, लेकिन 60 फीट की नई चौड़ाई ने कई परिवारों की एक इंच ज़मीन भी नहीं छोड़ी है। कई पीढ़ियों से बसे छोटे व्यापारी, दर्जी, और दिहाड़ी मजदूर अब सीधे सड़क पर आ जाएंगे।
आश्वासन सिर्फ मुंह जुबानी, लिखित गारंटी से मुकरा प्रशासन
अपने घरों को बचाने के लिए प्रभावित महिलाओं और कामगारों ने वार्ड पार्षद के साथ नगर निगम का घेराव किया।
महापौर जीवर्धन चौहान ने लोगों को टीवी टावर इलाके में फ्लैट देने और कम से कम तोड़फोड़ करने का मौखिक आश्वासन तो दिया, लेकिन जब जागरूक नागरिकों ने इसे लिखित में (हस्ताक्षर के साथ) मांगा, तो महापौर ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। इस बिना गारंटी वाले रवैये ने लोगों का गुस्सा और भड़का दिया है। जिला कांग्रेस ने भी अब इस मामले में जांच कमेटी बना दी है।
- अमीरों के लिए गरीबों की बलि क्यों? विकास जरूरी है, लेकिन बड़े बिल्डरों की कॉलोनियों को चमकाने के लिए कई पीढ़ियों से बसे गरीबों के आशियाने उजाड़ना कौन सा न्याय है?
- 60 फीट सड़क की जरूरत क्या है? जिस इलाके में भारी ट्रैफिक का कोई दबाव ही नहीं है, वहां नाले से दूर बस्ती के बीचों-बीच 60 फीट चौड़ी सड़क बनाने का कोई तकनीकी लॉजिक समझ नहीं आता। यह साफ तौर पर रसूखदारों को फायदा पहुंचाने की नीयत लगती है।
- लिखित गारंटी क्यों नहीं? देश का कानून कहता है कि बिना उचित पुनर्वास नीति के किसी को बेघर नहीं किया जा सकता। अगर निगम प्रशासन टीवी टावर में फ्लैट देने को तैयार है, तो उसे कागज पर लिखकर देने में क्या खौफ है?
- आगे क्या हो: प्रशासन को 29 मई की डेडलाइन पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। सड़क के बदले हुए ‘डिजाइन’ की उच्चस्तरीय जांच हो। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह बुलडोजर सिर्फ गरीबों के घरों को नहीं, बल्कि सिस्टम पर बचे-खुचे भरोसे को भी मटियामेट कर देगा।
