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रिश्वतखोर पटवारी विनोद अग्रवाल सस्पेंड सरेआम नोट लेते वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन की बड़ी कार्रवाई

कहते हैं कि पाप का घड़ा जब भरता है, तो वह बीच चौराहे पर ही फूटता है। कोरबा जिले के राजस्व विभाग में लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार के खेल का ऐसा ही एक और घड़ा सोशल मीडिया के चौराहे पर फूट गया है। पसान तहसील के हल्का नंबर-10 (सिर्री, पिपरिया) में तैनात पटवारी विनोद अग्रवाल का एक किसान से सरेआम नोट घसीटते हुए वीडियो वायरल क्या हुआ, मानों पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। आमतौर पर कछुए की रफ्तार से चलने वाले सरकारी सिस्टम ने इस बार ‘सुपरफास्ट’ रुख दिखाया और पोड़ी एसडीएम ने छुट्टी के दिन ही साहब की ‘छुट्टी’ करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया।
पट्टे के नाम पर ‘लूट’: अन्नदाता की जेब पर डाका
मामला पिपरिया ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम तेंदुपारा का है। जो वन अधिकार पट्टा एक गरीब किसान को उसका हक दिलाने के लिए मिलना चाहिए था, उसकी ऑनलाइन प्रविष्टि (इंट्री) करने के एवज में पटवारी विनोद अग्रवाल अपनी जेब गर्म कर रहे थे। वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि किस तरह बेखौफ होकर किसान की गाढ़ी कमाई की नकद राशि ली जा रही है।
ग्रामीणों की जुबानी, सिस्टम की कहानी:
“साहब, इस इलाके में बिना गांधी छाप (पैसे) के पत्ता भी नहीं हिलता। नामांतरण हो, खसरा बी-1 निकालना हो या वन अधिकार पट्टा… हर कागज की अपनी एक ‘कीमत’ तय कर दी गई है। हजारों की मांग यहां आम बात है।”
इस वीडियो के सामने आते ही ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा, जिसके बाद प्रशासन के पास आंखें मूंदने का कोई रास्ता नहीं बचा था।
कड़क एक्शन: छुट्टी के दिन भी चला शासन का हंटर
अक्सर देखा जाता है कि शिकायतें फाइलों में दबी रह जाती हैं, लेकिन इस बार पोड़ी एसडीएम ने संवेदनशीलता और तत्परता की एक मिसाल पेश की। रविवार/छुट्टी का दिन होने के बावजूद मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम ने तत्काल निलंबन का आदेश जारी किया। पटवारी विनोद अग्रवाल को सस्पेंड करने के साथ ही पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण: सिर्फ निलंबन काफी नहीं, जड़ से खत्म हो यह बीमारी

प्रशासन की इस त्वरित कार्रवाई का हम स्वागत करते हैं। छुट्टी के दिन भी एक्शन लेना यह दिखाता है कि अगर अफसर चाहें, तो भ्रष्टाचारियों की खैर नहीं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर एक गरीब किसान को अपने ही हक के काम के लिए वीडियो बनाने की नौबत क्यों आती है? क्यों हमारे सिस्टम में बिना ‘सुविधा शुल्क’ के जायज काम भी नहीं होते?

इस कार्रवाई से भ्रष्ट कर्मचारियों में खौफ तो जरूर पैदा हुआ है, लेकिन ग्रामीणों को असली राहत तब मिलेगी जब तहसील कार्यालयों से दलाली और घूसखोरी का यह ‘सदाबहार मौसम’ हमेशा के लिए खत्म होगा। जांच सिर्फ इस एक पटवारी तक सीमित न रहे, बल्कि इस रैकेट में शामिल हर सफेदपोश और बिचौलिए का चेहरा बेनकाब होना चाहिए।

इस कार्रवाई से भ्रष्ट कर्मचारियों में खौफ तो जरूर पैदा हुआ है, लेकिन ग्रामीणों को असली राहत तब मिलेगी जब तहसील कार्यालयों से दलाली और घूसखोरी का यह ‘सदाबहार मौसम’ हमेशा के लिए खत्म होगा। जांच सिर्फ इस एक पटवारी तक सीमित न रहे, बल्कि इस रैकेट में शामिल हर सफेदपोश और बिचौलिए का चेहरा बेनकाब होना चाहिए।

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