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महाविद्रोह: छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र की ‘बुनियाद’ खाली! अंतागढ़ के 56 सरपंचों ने एक साथ फेंका इस्तीफा

  • Raigarh

कांकेर/अंतागढ़। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के कांकेर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने राज्य की सत्ता से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक में भूचाल ला दिया है। अंतागढ़ ब्लॉक की सभी 56 ग्राम पंचायतों के सरपंचों ने एक सुर में, एक साथ अपने पदों से सामूहिक इस्तीफा दे दिया है। कलेक्ट्रेट परिसर के सामने आज का नजारा यह बताने के लिए काफी था कि पानी अब सिर से ऊपर जा चुका है। वहां जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि उनके इस्तीफों के पर्चों से लिपटी 56 खाली कुर्सियां सरकार से सवाल पूछ रही थीं।

  • 1. ‘जीरो बजट’ पर कैसे जिएं गांव? पिछले कई महीनों से अंतागढ़ ब्लॉक की सभी 56 पंचायतों का बजट शून्य बना हुआ है। सरपंचों का आरोप है कि फंड रोकने की यह क्रूरता सीधे तौर पर ग्रामीणों के पेट पर लात मारने जैसी है।
  • 2. बुनियादी ढांचे का ‘ब्लैकआउट’ सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं, नालियां बजबजा रही हैं, और सबसे संवेदनशील बात—पेजल योजनाएं ठप पड़ी हैं। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में जहां पानी के लिए हाहाकार मचता है, वहां पंचायतों को लाचार छोड़ दिया गया है।
  • 3. ‘वोट हमारा, राज तुम्हारा’ – ग्रामीणों का बढ़ता दबाव इस्तीफा देने वाले सरपंचों ने बंद कमरे की बातचीत में बताया, “सुबह उठते ही ग्रामीण हमारे दरवाजे पर आ जाते हैं। वे पूछते हैं कि नल में पानी क्यों नहीं आया? सड़क कब बनेगी? हम उन्हें क्या बताएं कि सरकार ने हमारी जेब और खाते दोनों खाली कर रखे हैं? ग्रामीणों की नाराजगी झेलने से बेहतर हमने कुर्सी छोड़ना समझा।”

इस सामूहिक इस्तीफे ने सीधे तौर पर जिला प्रशासन और राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कोई सामान्य नाराजगी नहीं है। यह नौकरशाही की उस तानाशाही के खिलाफ जमीनी नेताओं का ‘असहयोग आंदोलन’ है, जो फाइलों को दबाकर बैठी रहती है।

प्रभावित क्षेत्र

कुल पंचायतें

मुख्य ठप पड़े कार्य

मुख्य कारण

अंतागढ़ ब्लॉक

56 (शत-प्रतिशत)

पेयजल, नाली निर्माण, सड़क, सामुदायिक भवन

महीनों से फंड पर लगी अघोषित रोक

अंतागढ़ से उठी यह चिंगारी अब पूरे कांकेर जिले और फिर बस्तर संभाग में फैल सकती है। सूत्रों के मुताबिक, जिला प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं और सरपंचों को मनाने के लिए बंद कमरों में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। लेकिन सरपंचों का साफ कहना है—“बात अब वादों से नहीं, सीधे बैंक खातों में फंड ट्रांसफर होने से बनेगी।”

देखना होगा कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली व्यवस्था इन 56 खाली कुर्सियों को दोबारा कैसे भर पाती है, या फिर यह ग्रामीण विद्रोह सरकार के लिए गले की हड्डी बनेगा।

– ब्यूरो रिपोर्ट, ‘खबर नविस’

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